मुन्डा मे किली (गोत्र) का आविर्भाव
मुंडा परंपरा में एक लोकगीत है
"सुतियाम्बा कोड़ोम्बा रे मुंडा होन को किली को सला
केना ।" जिसका अर्थ है 'सुतियाम्बा कोड़ोम्बा में मुंडाओं ने किली को चुना।'
'किली' एक कुल की संतानों की पहचान है जिसमें एक वंश का रक्त प्रवाहित है तथा एक वंशीय या भाई-बहन होने के कारण इनमें वैवाहिक संबंध वर्जित है। किली (गोत्र), वंश की संज्ञा है जो उसके किसी मूल पुरूष के अनुसार होती है। किली के सभी अंग या व्यक्ति एक ही पुरखे का संतान है यह वंशधारा पितृपक्ष है अर्थात संतान में पिता की ही किली चलती है।
मुंडा परंपरा में किली गोत्र के संबंध में कुछ लोककथा मौजूद है। इन लोककथाओं में एक कथा के अनुसार छोटानागपुर राजा रिसा मुंडा ने सुतिया मुंडा को अपना पुजारी एवं प्रधानमंत्री (राजा)नियुक्त किया। सुतिया मुंडा ने एक मुंडा अगुआ को अपने पुत्र के विवाह के लिए कन्या खोजने का आदेश दिया । जब वह अगुआ कन्या खोजने निकला तब उसने पाया कि चारों ओर केवल महाराजा के निकट कुटुम्ब मौजूद थे और इसके कारण उचित कन्या नहीं मिल पायी। तब सुतिया मुंडा ने मुंडाओं के बीच किली गोत्र बाँटना उचित समझा और किली विभाजन के लिए एक उपाय सोचा। उन्होंने सुतियाम्बा गढ़ के फाटक के में पशु- पक्षी,छोटे बड़े जीव जंतुओं, वृक्ष,पेड़,पौधे,पत्ते फूल और अन्य वस्तुओं को रखवा लिया और 21 पड़हा राजाओं को आमंत्रित किया उन्होंने उनसे अपना मन पसंद गोत्र चुन लिया।
~ एक अन्य मान्यता के अनुसार 22 पड़हा में 22 गोत्रों का विभाजन हुआ।
कहा जाता है कि आरम्भ में मुंडाओं के कम ही गोत्र थे, पर जैसे जैसे उनकी संख्या बढ़ती गयी वैसे वैसे नए गोत्र का जन्म हुआ।

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